Breaking News in Primes

सोशल मीडिया पर नाबालिगों के अकाउंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का संगठन होलिस्टिक एक्शन रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट (हार्ड) ने किया स्वागत

0 3

*सोशल मीडिया पर नाबालिगों के अकाउंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का संगठन होलिस्टिक एक्शन रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट (हार्ड) ने किया स्वागत*

 

दैनिक प्राईम संदेश कोरिया छत्तीसगढ़ अजीमुदिन अंसारी

 

कोरिया/ जिले में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए जमीनी अभियान चला रहे होलिस्टिक एक्शन रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट (हार्ड) ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत किया है, जिसमें उसने केंद्र से इस संभावना पर विचार करने को कहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए ऐसे वैधानिक नियम बनाए जाएं, जिनके तहत उनके लिए नाबालिगों से संबंधित भारतीय कानूनों का पालन करना अनिवार्य हो।

नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि डिजिटल प्लेटफॉर्मों को इस बात का ध्यान रखने के निर्देश दिए जाएं कि नाबालिगों में अनुबंध करने की कानूनी अधिकार नहीं होता, इसलिए ऑनलाइन सेवाओं तक उनकी पहुंच के लिए जरूरी सुरक्षा उपाय लागू किए जाएं। संगठन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यह कदम जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) के बाल अधिकारों की सुरक्षा के अथक प्रयासों पर मुहर है। होलिस्टिक एक्शन रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट (हार्ड) जेआरसी का एक सहयोगी संगठन है। भारत में जेआरसी अपने सहयोगी संगठनों के साथ देश के सभी 782 जिलों में बाल अधिकारों के संरक्षण के लिए अभियान चला रहा है।

होलिस्टिक एक्शन रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट (हार्ड) के निदेशक सुशील कुमार शर्मा एवं कोरिया जिले के जिला समन्वयक गोकरण शुक्ला ने कहा कि हमारे बच्चों की सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों को भारत के कानूनों का उल्लंघन करने से रोका जाए। आज ऑनलाइन दुनिया में बच्चों के सामने कई तरह के खतरे मौजूद हैं। क्योंकि नाबालिग बच्चों को बहला-फुसलाकर यौन शोषण, ट्रैफिकिंग और सेक्सटॉर्शन जैसे कामों में आसानी से धकेला जा सकता है। इसके अलावा नाबालिगों के निजी डेटा का दुरुपयोग और साइबर बुलिंग जैसे जोखिम भी शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से बच्चों की ऑनलाइन शोषण से रक्षा हो सकेगी।

 

याचिका पर सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने की, जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। पीठ ने कहा कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के साथ स्वतंत्र रूप से अनुबंध करने के लिए 18 वर्ष की न्यूनतम आयु सीमा का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि यह महज एक दिशानिर्देश बनकर नहीं रहना चाहिए और केंद्र से इसे इंटरमीडियरी नियमों के ढांचे में शामिल करने पर विचार करने को कहा।

 

न्यायमूर्ति बागची ने केंद्र का पक्ष रख रहे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, “कृपया इंटरमीडियरी नियमों के तहत ऐसे निर्देश जारी करें कि वे अपने सॉफ्टवेयर या जिस भी रूप में उस प्लेटफॉर्म को संचालित करते हैं, उसे भारतीय कानून के अनुरूप तैयार करें। सॉफ्टवेयर को भारतीय कानून के अनुरूप होना ही चाहिए।” तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इस मुद्दे की जांच करेगी और आवश्यक कदम उठाएगी।

Leave A Reply

Your email address will not be published.

Don`t copy text!