खेल जगत का एक उपेक्षित सच: अर्जन सिंह और ‘बेबस’ बजरंगी प्रसाद की वह अनकही दास्तां पुअर’ बजरंगी प्रसाद: ओलंपिक से महरूम कर दिए गए उस भारतीय तैराकी के पितामह की कहानी
खेल जगत का एक उपेक्षित सच: अर्जन सिंह और ‘बेबस’ बजरंगी प्रसाद की वह अनकही दास्तां
पुअर’ बजरंगी प्रसाद: ओलंपिक से महरूम कर दिए गए उस भारतीय तैराकी के पितामह की कहानी

अर्जन सिंह एन्ड ‘पुअर’ बजरंगी प्रसाद!
स्मरण/जयराम शुक्ल
कुछेक साल पहले जब एयर मार्शल अर्जन सिंह के निधन की खबर टीवी पर देखी-सुनी तो उसके साथ ही एक पुरानी खबर आँखों के सामने तैर गई जो कई वर्षों से छाती में बोझ बनकर दफन थी। वह थी, 1964 के टाइम्स आफ इंडिया..की एक क्लिपिंग जिसे भारतीय तैराकी के पितामह और प्रथम अर्जुन पुरस्कार विजेता कैप्टन बजरंगी प्रसाद ने अपनी संदूकची से निकाल कर दिखाई थी। अँग्रजी में मोटे हर्फों में हेडिंग थी..अर्जन सिंह एन्ड पुअर बजरंगी प्रसाद..। ये खबर उस दिन की थी जब भारतीय टीम कलकत्ता के दमदम एयरपोर्ट से टोक्यो रवाना हो रही थी। एयरफोर्स के वाइस चीफ के साथ मिलेट्री के एक अदने से जमादार को जोड़कर ..यह खबर तत्कालीन अखबारों की सुर्खियों में क्यों रही यह किस्सा बाद में बताते हैं। पहले अर्जन सिंह के बारे में।
एयर मार्शल अर्जन सिंह को दुनिया जानती है क्योंकि सन् पैसठ के भारत पाक युद्ध में ये गेमचेंजर हीरो बनके उभरे। उस समय ये वायुसेना के प्रमुख थे। द्वितीय विश्वयुद्ध लड़ चुके अर्जन सिंह के खाते में वीरता और उपलब्धियों के कई गैलंटी मेडल हैं। ये अबतक के एक मात्र वायुसेना प्रमुख हैंं जिन्हें एयर मार्शल का सर्वोच्च सम्मानित ओहदा मिला। भारत सरकार ने इन्हें पद्मविभूषण से भी अलंकृत किया। ये इसके हकदार भी थे। इनके युद्ध कौशल पर हर भारतीय को गर्वानुभूति होनी चाहिए।
बजरंगी प्रसाद को देश के सिर्फ वही लोग जानते हैं जिनका खेल, खासकर तैराकी से लगाव है। यूपीएससी, पीएससी की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी भी हो सकता है जानते हों, क्योंकि कभीकभार ये प्रश्न पूछ लिया जाता है कि तैराकी का पहला अर्जुन पुरस्कार किसे मिला था…। बजरंगी प्रसाद भारतीय सेना में सिपाही के रूप में शामिल हुए। इससे पहले वे रीवाराज्य की सेना व्येंकट बटालियन में थे। आजादी के बाद यह बटालियन भारतीयसेना में मर्ज हो गई। ये मध्यप्रदेश के रीवा जिले के बड़ीहर्दी गांव के निवासी थे इनके पिताजी रीमाराज्य के चैम्पियन पहलवान और विश्वविजयी गामा के शिष्य थे। बजरंगी प्रसाद प्रवीण तो सभी खेलों में थे लेकिन चुना तैराकी को। गांव के नाले और तालाब से निकले बजरंगी प्रसाद जब स्वीमिंगपूल में उतरे तो धूम मच गई। सन् 52 से 61 तक ये भारतीय तैराकी के सुपरस्टार रहे। लगातार चैम्पियनशिप का नेशनल रेकार्ड अब तक अनब्रोकन है। डाइविंग में इन्होंने एशियाई रेकार्ड बनाया। तबतक दुनिया भर में तैराकी के क्षेत्र में इनका नाम हो चुका था। अमेरिकी ओलंपिक तैराकी टीम के चीफ कोच डा.सेमी ली ने इनके सम्मुख वैसा ही प्रस्ताव रखा था जैसा कि ध्यानचंद के सामने हिटलर ने। बजरंगी प्रसाद का भी वही जवाब था जोकि ध्यानचंद ने हिटलर को दिया। भारत के लिए खेलेंगे,भारत में जिएंगे, वहीं मरेंगे। वे रिटायर्डमेंट के बाद भी अमेरिका या अन्य देश जा सकते थे क्योंकि इन्होंने भारतीय तैराकी को वैश्विक बना दिया। अब तो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना ही बड़ी बात है। 60 के रोम ओलंपिक में इन्हें भारतीय दल में एक मात्र एक्वेटिक्स के रूप में चुना गया। नाम की घोषणा भी हुई। जिस दिन रवानगी थी उसी दिन फैसला लिया गया कि अब भारत एक्वेटिक इवेंट में भाग नहीं लेगा। ये जाते जाते रह गए।जबकि जापान व चीन की चुनौतियों के बीच इन्होंने डायविंग का एशियन रेकार्ड बनाया था। रोम ओलंपिक में बजरंगी प्रसाद के जरिए भारत तैराकी का इतिहास रच सकता है खेलपत्रकार ऐसा आकलन कर रहे थे। बहरहाल 61 में इन्हें अर्जुन पुरस्कार दिया गया। इसके बाद ये एन आई एस पटियाला में राष्ट्रीय कोच के रूप में सेवा देने लगे। परिणाम यह हुआ कि इनके सेना के ही दो शिष्यों सोहन सिंह और अनसूइया प्रसाद ने टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालीफाई किया। बजरंगी प्रसाद इस टीम के कोच कम मैनेजर नियुक्त हुए। टोक्यो के लिए दमदम से उड़ान भरने की तैयारी कर ही रहे थे कि कहानी में टि्वस्ट आ गया।
अब आगे.. अपने दो तैराक शिष्यों के साथ एयरपोर्ट पर जब ये भावी रणनीति बना ही रहे थे कि एक आदेश थमा दिया गया..बजरंगी प्रसाद अब आपकी जगह एयर वाइसचीफ अर्जन सिंह जाएंगे..। बिना किसी प्रतिक्रिया के, बिना वक्त गँवाए बजरंगी प्रसाद लौट चले अपने बैरक की ओर। ..टाइम्स आफ इंडिया ने इसी घटनाक्रम को खेल पेज का बैनर बनाया.. हेडिंग दी ..अर्जन सिंह एन्ड पुअर बजरंगी प्रसाद। स्टेट्समैन व कई अन्य अखबारों ने भी खबरें रची पर टाइम्स में लगभग यही पूरी कथा छपी जिसका मैंने ऊपर बयान किया। ये बात है..1964 की। संभव है कि टाइम्स के आर्काइव में सुरक्षित हो। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर गांव के बच्चों को नाले में तैराकी सिखाते देश का यह ..पुअर..खेल योद्धा 2005 में स्वर्ग सिधार गया।
जब हम देश में खेल के भविष्य की बात करें तो इस तरह के कई अनछुए किस्सों को जरूर सामने रखें। बजरंगी प्रसाद को कभी भी न अर्जन सिंह से गिला रहा, न अपनी गति और नियति से। पर मुझ जैसे तमाम खेलप्रेमियों को इस सड़े सिस्टम से गिला तबतक बरकरार रहेगा जब तक कोई बड़ा छोटे के हक पर इसी तरह डाका डालता रहेगा।
और अंत में दिलासा के लिए रहीम दास को सुमिरिए…
बडो़ काम ओछो करै तो न बडा़ई होय ।
कह रहीम हनुमंत को गिरधर कहै न कोय।।
संपर्कः। 8225812813