जुन्नारदेव:
सरकार गरीबों के उत्थान के लिए योजनाएं तो बनाती है, लेकिन धरातल पर बैठे कुछ जिम्मेदार सरकारी तंत्र की कमियों का फायदा उठाकर इन योजनाओं को पलीता लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। ताजा मामला ग्राम पंचायत उमराड़ी और एक अन्य पंचायतों में सामने आया है, जहाँ महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत मजदूरों की उपस्थिति दर्ज करने वाले NMMS (नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम) ऐप का खुला मजाक बनाया जा रहा है।
तकनीक को ढाल बनाकर भ्रष्टाचार का खेल
नियमों के मुताबिक, काम पर आए मजदूरों की ‘फेस रीडिंग’ (चेहरा पहचान) अनिवार्य है, ताकि फर्जी हाजिरी पर लगाम कसी जा सके। लेकिन पंचायत कर्मियों ने इसका तोड़ निकाल लिया है। हाल ही में 29 अप्रैल को उमराडी पंचायत में अपलोड की गई तस्वीरों में चौंकाने वाला खुलासा हुआ। सात में से छह फोटो में तो चेहरे दिख रहे हैं, लेकिन एक फोटो में केवल जमीन की तस्वीर अपलोड कर दी गई है। वहीं, अन्य पंचायतों में भी चेहरे की जगह हाथ, पैर और झाड़ियों की फोटो डालकर हाजिरी दर्ज की जा रही है।
जब इस संबंध में पंचायत कर्मियों से सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे ‘तकनीकी खराबी’ (Technical Problem) बताकर पल्ला झाड़ लिया। जानकारों का मानना है कि यह कोई तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि सरकार का पैसा हड़पने का एक सुनियोजित तरीका है।
सरकार का सख्त आदेश: लापरवाही पर कटेगा भुगतान
इस तरह की धांधली को देखते हुए मध्यप्रदेश राज्य रोजगार गारंटी परिषद ने 6 अप्रैल 2026 को एक सख्त पत्र (क्र. 1/926559/2026) जारी किया है। इस आदेश के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
100% सत्यापन अनिवार्य: ग्राम पंचायत स्तर पर सचिव और रोजगार सहायक को हर फोटो का 100% सत्यापन करना होगा।
अधिकारियों की जिम्मेदारी: जनपद स्तर पर कार्यक्रम अधिकारी को 20% और जिला स्तर पर जिला कार्यक्रम समन्वयक (DPC) को नियमित रूप से फोटो का परीक्षण करना होगा।
शून्य होगा मूल्यांकन: यदि NMMS में मजदूरों की फोटो फर्जी या त्रुटिपूर्ण पाई जाती है, तो उपयंत्री (Sub Engineer) को ई-एमबी (e-MB) में मूल्यांकन शून्य दर्ज करना होगा। यानी, गलत फोटो होने पर काम का कोई भुगतान नहीं किया जाएगा।
अनुशासनात्मक कार्यवाही: फर्जी उपस्थिति दर्ज करने वाले दोषियों के खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक कार्यवाही के निर्देश दिए गए हैं।
जवाबदेही से बच रहे जिम्मेदार
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ सरकार ने निगरानी तंत्र को मजबूत करने के लिए D-25 NMMS रिपोर्ट जैसे टूल दिए हैं, वहीं दूसरी तरफ पंचायत स्तर पर नियमों का कोई खौफ नजर नहीं आ रहा है। यदि समय रहते इन ‘तकनीकी बहानेबाजों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो सरकार की यह पारदर्शी व्यवस्था केवल कागजों तक सिमट कर रह जाएगी।
संपादकीय टिप्पणी: प्रशासन को चाहिए कि वह केवल कागजी आदेश जारी न करे, बल्कि फील्ड पर जाकर औचक निरीक्षण करे ताकि मजदूरों के हक का पैसा बिचौलियों की जेब में जाने से बच सके।