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रमज़ान की रौनक से चलती बाजार की धड़कन

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रमज़ान की रौनक से चलती बाजार की धड़कन

 

(एक निजी अनुभव)

 

✍️ मारूफ अहमद खान

 

रमज़ान का महीना शुरू होते ही माहौल बदल जाता है। जैसे ही चाँद का एलान होता है, बाजारों में एक अलग सी रौनक आ जाती है। शाम ढलते ही गलियों में चहल पहल बढ़ जाती है। खजूर, फल, पकौड़े, शरबत, सेवइयाँ हर तरफ इफ्तार की तैयारी दिखाई देती है।

 

मैं अपने मोहल्ले में हर साल यह बदलाव महसूस करता हूँ। दिन में सन्नाटा रहता है, लेकिन इफ्तार से पहले जैसे ही चार पांच बजते हैं, सड़क पर भीड़ बढ़ने लगती है। एक फल वाले शकील भाई हैं। उनका कहना है कि रमज़ान में उनकी बिक्री बाकी महीनों से काफी ज्यादा हो जाती है। अनुमान के अनुसार सिर्फ फल और खाने पीने की चीजों पर ही इस महीने में खर्च काफी बढ़ जाता है।

 

कपड़ों की दुकानों में भी रौनक दिखती है। नए कुर्ते, बच्चों के कपड़े, लड़कियों के सूट, चूड़ियां, जूते चप्पल सबकी मांग बढ़ जाती है। दर्जियों की दुकानों में देर रात तक काम चलता है। मेरे जानने वाले एक दर्जी कहते हैं कि अगर रमज़ान का सीजन अच्छा निकल जाए तो कई महीनों की चिंता कम हो जाती है।

 

अनुमानों के अनुसार रमज़ान और ईद के आसपास बाजार में हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त लेनदेन होता है। छोटे दुकानदारों, ठेले वालों, ऑटो चालकों और दिहाड़ी मजदूरों तक इसका फायदा पहुंचता है। पैसा एक जगह रुकता नहीं, बल्कि घूमता रहता है। यही चीज स्थानीय अर्थव्यवस्था को ताकत देती है।

 

रमज़ान का एक अहम हिस्सा जकात और सदका भी है। इस महीने लोग दिल खोलकर मदद करते हैं। राशन बांटना, जरूरतमंदों की फीस भरना, इलाज में सहायता देना आम बात है। इससे गरीब परिवारों के पास भी खर्च करने की ताकत आती है। जब उनके हाथ में पैसा आता है तो वह भी बाजार से सामान खरीदते हैं। इससे बाजार की रफ्तार बनी रहती है।

 

ईद से ठीक पहले का नज़ारा तो देखने लायक होता है। आखिरी दस दिनों में बाजार सचमुच जाग उठता है। रात देर तक दुकानें खुली रहती हैं। कई जगह तो ऐसा लगता है जैसे रात ही असली दिन हो। कपड़ों की दुकानों पर ट्रायल के लिए लाइन लग जाती है। बच्चों को नए जूते और कपड़े दिलाने की जल्दी रहती है। चूड़ी और इत्र की दुकानों पर इतनी भीड़ होती है कि कदम रखने की जगह नहीं मिलती।

 

मिठाई और सेवइयों की खुशबू दूर से ही लोगों को खींच लाती है। बेकरी वाले ओवरटाइम काम करते हैं। सैलून में बाल कटवाने वालों की लाइन लग जाती है। लड़के ईद की नमाज से पहले नया लुक चाहते हैं और लड़कियां मेहंदी लगवाने में व्यस्त रहती हैं। मेहंदी लगाने वाली महिलाओं की अच्छी कमाई हो जाती है।

 

ऑटो और ई रिक्शा वाले भी कहते हैं कि इन दिनों सवारी दोगुनी हो जाती है। गांव से लोग शहर आते हैं खरीदारी के लिए। ऑनलाइन शॉपिंग भी बढ़ जाती है, क्योंकि हर कोई चाहता है कि ईद पर घर में कुछ नया जरूर हो।

 

ईद से पहले की यह हलचल सिर्फ त्योहार की खुशी नहीं दिखाती, बल्कि यह भी बताती है कि एक महीना किस तरह छोटे बड़े हर कारोबार में जान डाल देता है। किसी के लिए यह नई उम्मीद है, तो किसी के लिए साल की सबसे अच्छी कमाई का मौका।

 

मेरे लिए रमज़ान और ईद का यह दौर सिर्फ इबादत या त्योहार नहीं, बल्कि मेहनत और बरकत का संगम है। बाजार की यह धड़कन ही बताती है कि जब समाज साथ चलता है तो अर्थव्यवस्था भी साथ चलती है।

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