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PCI की गाइडलाइंस या पत्रकारों पर लगाम ? सवाल पूछने वालों को चुप रहने की सलाह ! 

एक्सक्लूसिव फुटेज के नशे में चूर एडिटर्स अपने फील्ड रिपोर्टर से कहते हैं, भीड़ में घुसो लाठी खाओ, तभी देश तुम्हें जानेगा 

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PCI की गाइडलाइंस या पत्रकारों पर लगाम ? सवाल पूछने वालों को चुप रहने की सलाह !

 

एक्सक्लूसिव फुटेज के नशे में चूर एडिटर्स अपने फील्ड रिपोर्टर से कहते हैं, भीड़ में घुसो लाठी खाओ, तभी देश तुम्हें जानेगा

 

मनीष कुमार राठौर, 8109571743

 

15 अक्टूबर, 2026 का वह दिन भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक काले अक्षरों में दर्ज हो गया, जब भारतीय प्रेस परिषद (PCI) को यह औपचारिक रूप से घोषित करना पड़ा कि प्रदर्शनों की कवरेज अब एक युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो चुका है, यह सर्कुलर सिर्फ एक दिशानिर्देश नहीं, बल्कि उस *पेशे के चेहरे पर एक तमाचा है, जिसने सत्य की तलाश में निकलकर सनसनी को अपना नया भगवान बना लिया है।*

 

क्या पत्रकारिता अब रेगुलेशन के नाम पर सिमट रही है? प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की तरफ से प्रोटेस्ट और प्रदर्शनों की कवरेज के लिए जो नई गाइडलाइंस जारी की गई हैं, वो सीधे तौर पर पत्रकारों की आज़ादी और उनकी सुरक्षा के बीच एक बड़ा सवाल खड़ा करती हैं ? कागज़ पर ये गाइडलाइंस पत्रकारों की सेफ्टी के लिए बनाई गई लगती हैं, लेकिन अगर इनके नियमों को बारीकी से पढ़ा जाए, तो ये पत्रकारों को एक कंट्रोल्ड जोन में धकेलने की कोशिश जैसी दिखती हैं। पुलिस की टैक्टिकल मूवमेंट, रियल-टाइम पोजीशन और एस्केप रूट्स को ब्रॉडकास्ट न करने जैसे नियम पहले से ही मीडिया के हाथ बांधते हैं। वही बढ़ते अपराधों के बीच सुरक्षा के नाम पर पत्रकारों पर शिकंजा ।

 

एक तरफ पत्रकारों को पुलिस के आदेशों का पालन करने और टकराव से बचने की सलाह दी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ पत्रकारों पर हमले करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे। क्या ये गाइडलाइंस पत्रकारों को सुरक्षा के नाम पर सेंसरशिप की तरफ धकेलने की कोशिश है?

 

यह दिशानिर्देश एक सलाह है, कानून नहीं, अगर आज का पत्रकार इसे सिर्फ कागजी औपचारिकता मानकर आगे बढ़ेगा, तो यही दस्तावेज धूल फांकता रहेगा। और *उसकी कीमत हमेशा वह फील्ड रिपोर्टर चुकाएगा, जो सबसे आगे खड़ा होता है, न हेलमेट, न बुलेटप्रूफ जैकेट, बस एक कलम और एक कैमरा लेकर और पीछे बैठे न्यूज़रूम के ताकतवर लोग उसकी लहूलुहान तस्वीर को टीआरपी में बदलने की जुगत में लगे रहते हैं।* यही आज की पत्रकारिता की सबसे बड़ी त्रासदी है।

 

जब प्रेस परिषद को यह स्पष्ट करना पड़े कि सत्यापित तथ्यों और अपुष्ट दावों के बीच अंतर करें, तो यह सीधे तौर पर *उन मीडिया घरानों पर करारा जवाब है, जो अफवाहों को ब्रेकिंग का ताज पहनाकर बेचते हैं।* आज का पत्रकार जब प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच फंसा होता है, तो वह तटस्थ प्रेक्षक नहीं, बल्कि प्रायोजित योद्धा बन चुका है, जिसे किसी एक पक्ष का हीरो या विलेन साबित करने की जिद होती है। पुलिस, प्रशासन और प्रदर्शनकारियों, सभी के बयानों की समान पत्रकारिता जांच की मांग एक आदर्श स्थिति है, लेकिन आज के क्लिकबेट युग में यह एक दुर्लभ विलासिता बन गई है।

 

 

ये सिर्फ दिशानिर्देश नहीं हैं, बल्कि एक ऐसा चश्मा है जिसे पहनाकर पत्रकारों को गवाह बनाने की कोशिश की जा रही है, न कि सवाल पूछने वाला। जहां एक तरफ इसमें पत्रकारों को पुलिस के आदेशों का पालन करने और टकराव से बचने की बात कही गई है, वहीं दूसरी तरफ रियल-टाइम पुलिस मूवमेंट और एस्केप रूट्स को शेयर करने से रोका गया है। सवाल यह है कि क्या सुरक्षा के नाम पर किसी भी सरकारी व्यवस्था के खिलाफ सवाल उठाने वाली पत्रकारिता को सीमित किया जा रहा है? क्या ये गाइडलाइंस पत्रकारों को सिर्फ कवरेज के लिए नहीं, बल्कि दबाव में रखने का एक बहाना है? यह लेख इसी विरोधाभास और इसके पीछे की सच्चाई को उजागर करता है।

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