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ईदगाह विवाद के बीच सामने आया ऐतिहासिक सच, 70 वर्ष पुरानी तख्ती ने बताए निर्माण के तथ्य ईदगाह की स्थापना, निर्माणकर्ता और उद्देश्य को लेकर सामने आए नए तथ्य, वर्षों पुराने विवाद को मिल सकती है नई दिशा

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ईदगाह विवाद के बीच सामने आया ऐतिहासिक सच, 70 वर्ष पुरानी तख्ती ने बताए निर्माण के तथ्य

 

 

ईदगाह की स्थापना, निर्माणकर्ता और उद्देश्य को लेकर सामने आए नए तथ्य, वर्षों पुराने विवाद को मिल सकती है नई दिशा

दैनिक

प्राईम संदेश कोरिया एमसीबी छत्तीसगढ़ स्टेट हेड अजीमुदिन अंसारी

 

एमसीबी/मनेंद्रगढ़।

मनेंद्रगढ़ स्थित ईदगाह भूमि को लेकर वर्षों से चले आ रहे विवाद के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक खुलासा सामने आया है, जिसने पूरे मामले को नई दिशा दे दी है। लंबे समय से ईदगाह की जमीन, उसके प्रबंधन और स्वामित्व को लेकर विभिन्न पक्षों के बीच चल रही बहस के बीच अब एक 70 वर्ष पुरानी तख्ती चर्चा का विषय बना हुआ है। इस तख्ती में दर्ज जानकारी ने न केवल ईदगाह के निर्माण से जुड़े इतिहास को उजागर किया है, बल्कि उन धारणाओं पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं जो वर्षों से इस धार्मिक स्थल को लेकर प्रचलित रही हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सलीम राज के निर्देश पर वक्फ बोर्ड सदस्य फैजान सर्वर खान ने मनेंद्रगढ़ पहुंचकर विवादित ईदगाह परिसर का निरीक्षण किया। निरीक्षण के दौरान ईदगाह से जुड़े दस्तावेजों, स्थानीय लोगों की जानकारी और परिसर में मौजूद ऐतिहासिक तख्ती का अवलोकन किया गया। इसी दौरान सामने आए तथ्यों ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया।

1956 की तख्ती ने खोले इतिहास के पन्ने

निरीक्षण के दौरान ईदगाह परिसर में लगी एक पुरानी तख्ती विशेष आकर्षण का केंद्र रही। बताया गया कि यह तख्ती वर्ष 1956 में ईदगाह के निर्माण के समय ही स्थापित की गई थी और आज भी सुरक्षित अवस्था में मौजूद है।

ईदगाह के निर्माता शेख मोहम्मद अब्दुल्ला के नवासे ने वक्फ बोर्ड सदस्य को महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि उनके नाना, जो उस समय पुलिस इंस्पेक्टर के पद पर पदस्थ थे और जिनका संबंध मुकद्दमगंज, जबलपुर से था, उन्होंने अपनी पत्नी खैरुन्निशा बेगम की याद में इस ईदगाह का निर्माण कराया था।

उनके अनुसार, 25 जून 1956 को निर्मित इस ईदगाह का उद्देश्य किसी विवाद या विशेष धार्मिक समूह की पहचान स्थापित करना नहीं था, बल्कि यह एक धार्मिक और सामाजिक भावना से जुड़ा कार्य था। ईदगाह निर्माण के पीछे उनकी मरहूमा पत्नी के लिए इसाले सवाब (पुण्य समर्पण) और दुआ-ए-मगफिरत की भावना थी।

तख्ती पर दर्ज है दुआ की अपील

बताया जाता है कि तख्ती पर स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि ईदगाह का निर्माण खैरुन्निशा बेगम की याद में कराया गया था तथा यहां ईद की नमाज अदा करने वाले लोगों से उनके लिए दुआ करने की अपील की गई थी।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह तख्ती वर्षों से ईदगाह परिसर में लगी हुई है, लेकिन विवाद के दौरान शायद ही कभी इसकी ऐतिहासिक महत्ता पर गंभीरता से ध्यान दिया गया हो। अब जब यह तख्ती चर्चा में आई है, तो कई पुराने सवालों के जवाब भी सामने आते दिखाई दे रहे हैं।

ईदगाह को लेकर बनी धारणाओं पर उठे सवाल

ईदगाह निर्माता के परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, वर्षों से कुछ लोग इस ईदगाह को किसी विशेष जमाअत या मसलक से जोड़कर देखते रहे हैं। हालांकि तख्ती में दर्ज विवरण और पारिवारिक इतिहास कुछ और ही कहानी बयान करता है।

परिवार का दावा है कि ईदगाह का निर्माण किसी धार्मिक गुट विशेष के लिए नहीं, बल्कि आम मुस्लिम समाज के लिए कराया गया था। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या वर्षों से चली आ रही कुछ धारणाएं ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाती हैं या नहीं।

वक्फ बोर्ड सदस्य ने कहा—तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर हो समाधान

निरीक्षण के दौरान वक्फ बोर्ड सदस्य फैजान सर्वर खान ने स्थानीय नागरिकों, समाज के वरिष्ठ लोगों और संबंधित पक्षों से चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसी भी धार्मिक स्थल से जुड़े विवाद का समाधान भावनाओं के बजाय तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड का उद्देश्य किसी पक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि वास्तविक स्थिति को समझना और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर उचित तथ्य सामने लाना है। साथ ही उन्होंने सभी पक्षों से शांति, सौहार्द और सामाजिक एकता बनाए रखने की अपील की।

एसडीएम न्यायालय में विचाराधीन है पूरा मामला

ईदगाह भूमि से जुड़ा विवाद वर्तमान में एसडीएम न्यायालय में विचाराधीन है। प्रशासनिक और न्यायिक स्तर पर मामले की सुनवाई जारी है। ऐसे में निरीक्षण के दौरान सामने आए ऐतिहासिक दस्तावेज, तख्ती और अन्य अभिलेख भविष्य की कार्यवाही में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हालांकि अंतिम निर्णय न्यायालय और सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी द्वारा ही लिया जाएगा, लेकिन 70 वर्ष पुरानी तख्ती के सामने आने से मामले में नए तथ्यों की चर्चा तेज हो गई है।

70 वर्षों से इतिहास की गवाही दे रही है तख्ती

स्थानीय बुजुर्गों और क्षेत्रवासियों के अनुसार, ईदगाह परिसर में लगी यह तख्ती पिछले लगभग सात दशकों से उसी स्थान पर मौजूद है। समय के साथ भले ही कई परिस्थितियां बदली हों, लेकिन यह तख्ती आज भी उस दौर के इतिहास और ईदगाह की स्थापना की मूल भावना की गवाही दे रही है।

इसी कारण अब यह तख्ती केवल एक पत्थर का टुकड़ा नहीं, बल्कि मनेंद्रगढ़ की धार्मिक और सामाजिक विरासत का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बनकर उभरी है।

फिलहाल पूरे क्षेत्र की निगाहें न्यायिक प्रक्रिया पर

मनेंद्रगढ़ ईदगाह विवाद में सामने आया यह ऐतिहासिक खुलासा क्षेत्रभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। 70 वर्ष पुरानी तख्ती से मिले तथ्यों ने जहां इतिहास के कई पन्ने खोल दिए हैं, वहीं लोगों की निगाहें अब प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि ऐतिहासिक अभिलेखों और उपलब्ध दस्तावेजों को इस विवाद के संदर्भ में किस प्रकार देखा जाता है और इसका अंतिम निष्कर्ष क्या निकलता है।

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