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आजादी के 78 साल बाद भी अंधेरे में कैद दमगढ़ बिजली के बिना भविष्य की जंग लड़ता एक गांव, सरकारी योजनाओं पर खड़े करता है बड़े सवाल

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आजादी के 78 साल बाद भी अंधेरे में कैद दमगढ़

 

बिजली के बिना भविष्य की जंग लड़ता एक गांव, सरकारी योजनाओं पर खड़े करता है बड़े सवाल

 

ज्ञानेन्द्र पांडेय 8516868379

अनूपपुर

आजादी के 78 वर्ष बीत जाने के बाद भी अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विकासखंड का दमगढ़ गांव आज तक बिजली की रोशनी नहीं देख सका है। यह गांव आज भी अंधेरे में डूबा हुआ है, जहां बच्चों की पढ़ाई दीयों और मोबाइल की झिलमिलाती रोशनी में होती है, किसान सिंचाई के लिए डीज़ल और बैटरी पंपों पर निर्भर हैं और महिलाओं को घरेलू कामकाज के लिए रोज संघर्ष करना पड़ता है।

दमगढ़ की यह स्थिति न केवल एक गांव की पीड़ा है, बल्कि यह ग्रामीण विकास की विफलता और प्रशासनिक उदासीनता का जीवंत उदाहरण भी है।

 

 

अंधेरे में शिक्षा, संघर्ष में भविष्य

 

 

गांव के बच्चे कलेक्टर, इंजीनियर और डॉक्टर बनने के सपने तो देखते हैं, लेकिन उनकी पढ़ाई आज भी अंधेरे में सिमटी हुई है। रात के समय पढ़ाई के लिए न तो पर्याप्त रोशनी है और न ही डिजिटल संसाधनों की सुविधा। कई छात्र मोबाइल की टॉर्च या मिट्टी के दीयों के सहारे किताबें खोलते हैं।

शिक्षाविदों का मानना है कि बिजली के अभाव का सीधा असर बच्चों की शैक्षणिक प्रगति पर पड़ता है। रात में पढ़ाई न हो पाने से न केवल उनका आत्मविश्वास कमजोर होता है, बल्कि उच्च शिक्षा और रोजगार के अवसर भी उनसे दूर होते चले जाते हैं।

 

खेती पर अंधेरे का साया

 

दमगढ़ के किसान भी बिजली की कमी से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। सिंचाई के लिए उन्हें डीज़ल या बैटरी पंपों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे खेती की लागत कई गुना बढ़ जाती है। महंगे ईंधन और सीमित संसाधनों के कारण किसान आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।

इसका सीधा असर फसल उत्पादन और किसानों की आय पर पड़ रहा है। सीमित लाभ और बढ़ती लागत के बीच किसान आज भी संघर्षरत जीवन जीने को मजबूर हैं।

 

 

महिलाओं के लिए रोजमर्रा की जद्दोजहद

 

बिजली न होने का सबसे बड़ा बोझ गांव की महिलाओं पर पड़ता है। पानी भरने से लेकर भोजन पकाने और अन्य घरेलू कार्यों तक, हर काम कठिन हो जाता है। रात के समय अंधेरे में काम करना न केवल असुविधाजनक है, बल्कि कई बार असुरक्षित भी साबित होता है।

 

 

सौभाग्य योजना पर सवाल

 

 

मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2017 में सौभाग्य योजना की शुरुआत की थी, जिसका उद्देश्य हर घर तक बिजली पहुंचाना था। योजना के तहत मुफ्त बिजली कनेक्शन और सब्सिडी की घोषणा की गई, लेकिन दमगढ़ जैसे गांव आज भी इस योजना के वास्तविक लाभ से वंचित हैं।

यह सवाल खड़ा करता है कि जब सरकारी कागजों में गांव रोशन दिखाए जाते हैं, तो हकीकत में दमगढ़ जैसे गांव अंधेरे में क्यों हैं?

 

 

ऊर्जा उत्पादन के बीच अंधेरे में गांव

 

यह विडंबना ही है कि जिस अनूपपुर जिले में अमरकंटक ताप विद्युत गृह (चचाई), हिंदुस्तान पावर प्लांट और अन्य ऊर्जा परियोजनाएं संचालित हो रही हैं, उसी जिले का दमगढ़ गांव आज भी बिजली से वंचित है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह विकास की असमानता और योजनाओं के क्रियान्वयन में गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।

 

286 की आबादी, सुविधाएं शून्य

 

करीब 286 की आबादी वाले इस गांव में सड़क तो है, लेकिन बिजली, मोबाइल नेटवर्क और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं नदारद हैं। ग्रामीणों का कहना है कि केवल योजनाओं की घोषणा करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन और निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

 

प्रशासनिक उदासीनता की तस्वीर

 

ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के कारण समस्या वर्षों से जस की तस बनी हुई है। कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन आज तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।

 

 

उम्मीद अब भी बाकी

 

 

इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद दमगढ़ के ग्रामीण आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि सरकार उनकी पीड़ा को समझेगी और अपनी योजनाओं को धरातल पर उतारेगी। गांव के लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे भी रोशनी में पढ़ें, किसान आधुनिक खेती कर सकें और महिलाएं सम्मानजनक व सुरक्षित जीवन जी सकें।

 

दमगढ़ की कहानी एक चेतावनी है

 

यह कहानी बताती है कि विकास की असली परीक्षा बड़े शहरों या परियोजनाओं में नहीं, बल्कि दमगढ़ जैसे छोटे गांवों में होती है। जब तक इन गांवों तक रोशनी नहीं पहुंचेगी, तब तक विकास के दावे अधूरे ही रहेंगे।

अब जरूरत है कि सरकार और प्रशासन दमगढ़ के अंधेरे को दूर करें ताकि यह गांव भी रोशनी, शिक्षा और विकास की मुख्यधारा से जुड़ सके।

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