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बैकुंठपुर की जीवनदायिनी गेज नदी में बह रहा ज़हर, 20 वार्डों के लोग दूषित पानी पीने को मजबूर

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बैकुंठपुर की जीवनदायिनी गेज नदी में बह रहा ज़हर, 20 वार्डों के लोग दूषित पानी पीने को मजबूर

 

दैनिक

प्राईम संदेश कोरिया छत्तीसगढ़

स्टेट हेड अजीमुदिन अंसारी

 

बैकुंठपुर, कोरिया: जिले की एकमात्र प्रमुख गेज नदी, जो कभी नगरवासियों के लिए जीवनदायिनी थी, अब मौत का संदेश लेकर बह रही है। नगर प्रशासन की घोर लापरवाही और उदासीनता के कारण शहर का गंदा पानी, शौचालयों का मल-मूत्र, मेडिकल वेस्ट और कचरा नदी में सीधे प्रवाहित किया जा रहा है।

 

नगर पालिका परिषद नेता प्रतिपक्ष अन्नपूर्णा प्रभाकर सिंह ने पूर्व में भी कई बार इस गंभीर मुद्दे को लेकर प्रशासन को पत्राचार किया, लेकिन अब तक कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई। स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि पिछली बार नदी का जलस्तर इतना गिर गया था कि पानी पूरी तरह सूख गया, जिससे नगरवासियों को पीने तक का पानी नहीं मिला।शहरवासियों के पास स्वच्छ जल का कोई दूसरा स्रोत नहीं नगर पालिका क्षेत्र के 20 वार्डों के लगभग 20,000 लोग और आसपास के हजारों ग्रामीण दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। समस्या यह है कि नगर प्रशासन ने गेज नदी के अलावा शहरवासियों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कोई ठोस समाधान तक नहीं निकाला।पिछली बार जब नदी सूख गई थी, तब नगरवासियों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ा। सरकारी नलकूपों और टंकियों की भी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की गई। गर्मी के दिनों में यह समस्या और विकराल हो जाती है, जिससे नगरवासी प्रशासन की अनदेखी का खामियाजा भुगतने को मजबूर हैं। शौचालय का गंदा पानी सीधे नदी में, हजारों कुंटल मल-मूत्र बह रहा शहर के घरेलू और सार्वजनिक शौचालयों का गंदा पानी सीधे नालियों में छोड़ा जा रहा है, और फिर ये नालियां बिना किसी ट्रीटमेंट के नदी में मिल रही हैं। नतीजतन, हर दिन हजारों कुंटल मल-मूत्र और गंदगी गेज नदी में समा रही है।

नगर पालिका की सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का अभाव, कचरा प्रबंधन की असफलता और जिम्मेदार अधिकारियों की अनदेखी ने नदी को गंदे पानी का भंडार बना दिया है।मेडिकल वेस्ट, मांस के टुकड़े और कचरे से नदी बनी बीमारियों की जड़ नगर का कचरा एकत्र करने वाला एसएलआरएम सेंटर नदी के किनारे ही कूड़ा फेंक रहा है। यह कचरा हवा और पानी के प्रवाह से नदी में मिल जाता है, जिससे नदी पूरी तरह दूषित हो चुकी है।इस गंदगी में मेडिकल वेस्ट, पट्टियां, इंजेक्शन, मलहम, खून से सने कपड़े, मांस के लोथड़े और अन्य जहरीले अपशिष्ट शामिल हैं, जिसे आवारा कुत्ते और अन्य जानवर नदी किनारे फैला देते हैं। इस अस्वच्छ और खतरनाक पानी को नगरवासी मजबूरी में इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे गंभीर बीमारियां फैल रही हैं।

धार्मिक आस्था को ठेस, आचमन योग्य जल अब ज़हरीला

गेज नदी न केवल नगरवासियों के लिए जल स्रोत है, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था का भी केंद्र रही है। मरनी-भागवत हो, सावन की पूजा, ग्राम देवताओं की आराधना, छठ महापर्व, गणेश विसर्जन जैसे धार्मिक अनुष्ठानों के लिए इस नदी का जल पवित्र माना जाता था।लेकिन अब इसी जल में मल-मूत्र, मेडिकल कचरा और अन्य गंदगी बह रही है। धार्मिक आयोजनों के दौरान श्रद्धालु आचमन तक नहीं कर पा रहे। यह संस्कृति और आस्था पर गहरी चोट है। दूषित जल से फैल रही बीमारियां, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित नदी का यह प्रदूषित जल अब लोगों की सेहत पर सीधा असर डाल रहा है। टाइफाइड, डायरिया, पीलिया, पेट संक्रमण और त्वचा रोग तेजी से फैल रहे हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस पानी में खतरनाक बैक्टीरिया और वायरस पनप रहे हैं, जिससे बैकुंठपुर के हजारों लोग गंभीर बीमारियों की चपेट में आ सकते हैं। खासकर बच्चों, बुजुर्गों और गर्भवती महिलाओं के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है।

NGT के नियमों की खुलेआम अवहेलना, प्रशासन मौन

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सख्त नियमों के बावजूद नगर प्रशासन इस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा।NGT के अनुसार:

✔ किसी भी जलस्रोत में बिना शुद्धिकरण के गंदा पानी नहीं छोड़ा जा सकता।

✔ मेडिकल और जैविक कचरे के निपटान के लिए विशेष व्यवस्था होनी चाहिए।

✔ नदी में प्लास्टिक, गंदगी और हानिकारक अपशिष्ट फेंकना गैरकानूनी है।

 

लेकिन नगर पालिका इन नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रही है।नगर पालिका परिषद में नेता प्रतिपक्ष अन्नपूर्णा प्रभाकर सिंह ने इस गंभीर समस्या पर कलेक्टर एवं नगर प्रशासन को पत्र लिखकर तत्काल वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट लगाने एवं नदी में गंदगी डालने पर रोक लगाने की मांग की है।अन्नपूर्णा प्रभाकर सिंह ने कहा:हर साल करोड़ों रुपए सफाई और जल आपूर्ति पर खर्च किए जाते हैं, फिर भी स्थायी समाधान नहीं निकाला जाता। नगरवासियों की जिंदगी से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”बैकुंठपुर की धरोहर को बचाने की जरूरत कोरिया जिले की एकमात्र जीवनदायिनी गेज नदी का अस्तित्व खतरे में है। अगर इसे बचाने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ी इस नदी को केवल तस्वीरों में देखेगी।अब सवाल यह उठता है कि:

❓ क्या प्रशासन इस मुद्दे पर गंभीर होगा?

❓ क्या नगरवासियों को खुद सड़कों पर उतरकर अपनी जीवनदायिनी नदी को बचाने की लड़ाई लड़नी होगी?

 

अगर अब भी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में गेज नदी पूरी तरह प्रदूषित होकर एक मृत जलधारा में बदल जाएगी, जिसका खामियाजा पूरे नगरवासियों को भुगतना पड़ेगा।

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