लोकेशन धामनोद
*_काली रेत की आड़ में बालू का खेल . . . !_*
*_डम्पर MP09GH9737 पर सिर्फ मोटर व्हीकल एक्ट की कार्रवाई, अवैध खनन और खनिज परिवहन पर चुप्पी क्यों?_*
*_तहसीलदार और माइनिंग विभाग नहीं पहुंचे, फिर कैसे तय हो गया कि मामला केवल दस्तावेजों का था?_*
*धामनोद।* गुलझरा फाटे पर रविवार को पुलिस द्वारा पकड़े गए पीले रंग के डम्पर क्रमांक MP09GH9737 ने क्षेत्र में चल रहे कथित अवैध रेत कारोबार की परतें खोल दी हैं। पुलिस के अनुसार डम्पर में ऊपर काली रेत भरी हुई थी, लेकिन उसे हटाकर देखने पर नीचे बालू रेत भी भरी होना पाई गई। इसके बावजूद पूरे मामले में अवैध खनन, अवैध खनिज परिवहन अथवा खनिज नियमों के उल्लंघन से संबंधित कोई कार्रवाई सामने नहीं आई।
पुलिस ने चालक रमेश पिता मुतरिया डावर, निवासी सामर तलाई, जिला बड़वानी के खिलाफ केवल धारा 194, 146/196, 192/56 तथा 190(2) मोटर व्हीकल एक्ट के तहत इस्तगासा क्रमांक 22/2026 तैयार किया। हैरानी की बात यह है कि जिन धाराओं में कार्रवाई की गई है, वे मुख्य रूप से वाहन संचालन, दस्तावेज और परिवहन संबंधी नियमों से जुड़ी हैं। जबकि पुलिस स्वयं यह बता रही है कि वाहन में ऊपर काली रेत और नीचे बालू रेत भरी हुई थी।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब वाहन में दो अलग-अलग प्रकार की रेत होने की बात सामने आई, तब मौके पर माइनिंग विभाग और राजस्व विभाग के जिम्मेदार अधिकारी क्यों नहीं पहुंचे? यदि बालू रेत वैध थी तो उसके दस्तावेज कहां हैं, और यदि अवैध थी तो खनिज अधिनियम के तहत कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्षेत्र में लंबे समय से यह चर्चा है कि काली रेत की आड़ में बालू रेत का परिवहन नया खेल नहीं है। आरोप लगते रहे हैं कि ऊपर दूसरी सामग्री भरकर नीचे बालू रेत परिवहन करने की तरकीब का उपयोग जांच एजेंसियों की नजर से बचने के लिए किया जाता है। ऐसे में गुलझरा फाटा पर पकड़ा गया डम्पर इस पूरे नेटवर्क की ओर संकेत करता नजर आ रहा है।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि धामनोद क्षेत्र में प्रतिदिन रेत से भरे ट्रैक्टर और डम्पर सड़कों पर दौड़ते दिखाई देते हैं। कई वाहन मुख्य मार्गों और पुलिस थाने के सामने से भी गुजरते हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर विरले ही कोई बड़ा मामला सामने आता है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासन अवैध खनन की जड़ों तक पहुंचना चाहता है या केवल औपचारिक कार्रवाई कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान रहा है?
विश्वस्त सूत्रों के अनुसार पूरे मामले में राजनीतिक रसूख और दबाव की चर्चाएं भी क्षेत्र में तैर रही हैं। हालांकि इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन यह चर्चा जरूर है कि अवैध खनन और परिवहन के बड़े नेटवर्क तक कार्रवाई पहुंचने से पहले ही दबाव बनने लग जाता है।
अब जनता जानना चाहती है कि जब पुलिस को वाहन में काली रेत के नीचे बालू रेत मिली, तब खनिज विभाग को बुलाकर जांच क्यों नहीं कराई गई? आखिर अवैध खनन की आशंका वाले मामले को केवल मोटर व्हीकल एक्ट तक सीमित क्यों रखा गया? इन सवालों का जवाब मिलना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि मामला केवल एक डम्पर का नहीं, बल्कि नर्मदा अंचल में लंबे समय से चर्चा में रहे रेत कारोबार की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही का है।