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मेरा घरोंदा कहाँ? मैं क्या नौकरी छोड़कर घर पर बैठ जाऊँ? बच्चों को संभाल लूँ?”

राजेश ने गुस्से में आवाज़ ऊँची करते हुए कहा।

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मेरा घरोंदा कहाँ? मैं क्या नौकरी छोड़कर घर पर बैठ जाऊँ? बच्चों को संभाल लूँ?

 

राजेश ने गुस्से में आवाज़ ऊँची करते हुए कहा।

 

“तो क्या मैं बेवकूफ हूँ, जो अपना करियर छोड़कर घर पर बैठी हूँ?”

रेखा की आवाज़ भी अब काँपते गुस्से से भर चुकी थी।

“तुम्हारे बच्चे को पाल रही हूँ, तुम्हारा घर संभाल रही हूँ…

तुम तो ऑफिस में जाकर आराम से बैठते हो। तुम्हें क्या पता यहाँ कितना काम होता है!”

राजेश का चेहरा तमतमा उठा।

अगले ही पल उसने पास रखा बर्तन ज़मीन पर फेंक दिया।

“अगर इतनी ही परेशानी है मेरे घर में…

तो चली जाओ अपने बाप के घर!”

राजेश के शब्द रेखा को तीर की तरह चुभ गए।

कमरे में कुछ पल पहले का शोर अचानक सन्नाटे में बदल गया।

रेखा वहीं खड़ी रह गई—जैसे किसी ने उसके पैरों को ज़मीन में गाड़ दिया हो।

राजेश गुस्से में दरवाज़ा जोर से बंद कर बाहर चला गया।

अब कमरे में सिर्फ खामोशी थी…

और रेखा के भीतर उठता हुआ एक तूफान।

वह धीरे से सोफे पर बैठ गई।

उसकी आँखें कहीं दूर शून्य में खो गईं।

जिस घर में वह रहती है… क्या वह सचमुच उसका अपना है?

मायका… वह पहले ही छोड़ चुकी है।

राजेश के शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे—

क्या सचमुच यह घर उसका नहीं है?

उसके मन में एक के बाद एक सवाल उठने लगे—

अगर वह वापस मायके चली जाए तो क्या होगा?

पिता की हालत पहले ही कमजोर है।

एक छोटी बहन है, जिसकी शादी अभी बाकी है।

एक छोटा भाई है, जिसकी पढ़ाई चल रही है।

और वह?

एक शादीशुदा, बच्चे वाली बेटी… वापस उसी घर में?

समाज क्या कहेगा?

और क्या कोई उसकी बहन से शादी करेगा,

अगर बड़ी बहन “घर छोड़कर आई हुई” कहलाए?

रेखा की आँखों में आँसू आ गए।

लेकिन इस बार ये आँसू सिर्फ दुख के नहीं थे…

बल्कि एक कड़वी सच्चाई के थे।

वह पढ़ी-लिखी है।

एमबीए किया है।

अगर चाहे तो नौकरी कर सकती है…

अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है।

लेकिन क्या वह अपने बच्चे को वह समय दे पाएगी,

जो वह अभी दे रही है?

क्या वह एक नई जिंदगी शुरू कर पाएगी?

हर सवाल का जवाब एक नए सवाल में बदल रहा था।

रेखा के स्वाभिमान पर बहुत गहरी चोट लगी थी…

पर फिर भी उसने उस दर्द का घूँट चुपचाप भीतर ही पी लिया।

वह कुछ देर तक अपने बेटे कपिल को देखती रही—

उसकी मासूमियत, उसकी निश्चिंत नींद…

जैसे इस घर की सारी कड़वाहट से अनजान हो।

रेखा की आँखें फिर भर आईं,

पर इस बार उसने आँसू गिरने नहीं दिए।

उसके मन में एक विचार धीरे-धीरे आकार लेने लगा—

“क्यों न मैं यहीं रहकर… सब कुछ बदलने की कोशिश करूँ?”

वह जानती थी कि यह रास्ता आसान नहीं होगा।

हर दिन उसे अपने ही भीतर लड़ना होगा।

हर शब्द, हर ताना… फिर से चुभेगा।

लेकिन उसने ठान लिया—

वह राजेश को बदलने की कोशिश करेगी,

गुस्से से नहीं…

अपने धैर्य और समझ से।

और अपने बेटे कपिल को…

वह एक करुणामय इंसान बनाएगी।

क्योंकि करुणा से ही सच्ची समझ जन्म लेती है।

वह उसे ऐसा इंसान बनाएगी

जो अपने परिवार, अपने समाज और अपने देश के प्रति

जिम्मेदार और ईमानदार नागरिक बने।

रेखा ने कपिल के माथे पर हाथ फेरा

और बहुत धीमे से कहा—

“मैं तुम्हें ऐसा इंसान बनाऊँगी…

कि आने वाले समय में

किसी और रेखा को ये शब्द कभी सुनने न पड़ें…”

उसने चारों ओर देखा—

दीवारें वही थीं, घर वही था…

लेकिन अब उसके भीतर एक नया साहस जन्म ले चुका था।

शायद यही उसका घरौंडा था—

जिसे अब उसे टूटने नहीं देना था,

बल्कि अपने धैर्य, स्वाभिमान और प्रेम से

धीरे-धीरे फिर से बनाना था।

 

-कार्तिकेय कौतू

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