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आदिवासी क्षेत्रों में मानव अधिकारों कि पहुँच (घरातल पर लोकतंत्र का वास्तविक मूल मन्त्र )

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आदिवासी क्षेत्रों में मानव अधिकारों कि पहुँच (घरातल पर लोकतंत्र का वास्तविक मूल मन्त्र )

 

खंडवा::मध्यप्रदेश के ऐसे जनजातीय क्षेत्र जहाँ मूलभूत सुविधाओं (सड़क, बिजली, पानी कि पहुँच सुदूर इलाकों में नहीं हो पा रही है सरकारें भी वर्षों से पांचवी अनुसूची के जनजतीय क्षेत्रों को विशेष पैकेज के तहत समाज कि मुख्य धारा से जोड़ने के लिए प्रयासरत है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बया करती है ऐसे माहौल में जब मानव अधिकारों कि बात कि जाए तो लोगों के गले से न उत्तर पाना लाजमी है जब जनजातीय क्षेत्रों से पिछली पीढी मजबूर और आने वाली पीढ़ी रोटी रोजी के लिए संघर्ष कर रही होती है तो आगे आने वाली पीढ़ी के उत्थान के रस्ते भी बंद हो जाते हैं।

 

खंडवा जिले के खालवा क्षेत्र जो कि कोरकू आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है यहाँ भी प्रकृति पूजकों को दैनिक जीवन मे इन सभी परेशानियों से दो चार होना पड़ता है कई ऐसी भी समस्या है जो सरकारों को समस्या ही नहीं प्रतीत होती सम्मान जनक जीवन जीने के मायने यहाँ दो वक्त कि रोटी मिल जाना ही मान सकते है जिसके आभाव में बच्चे और महिलाएं कुपोषण के कुचक्र में फंसी हुई देखने को मिलती है जिससे बच्चों कि शारीरिक वृद्धि मानसिक विकास बाधित होता है और अशिक्षा, रोजगार संकट का चक्र चलता रहता है।

 

रोजगार कि तलाश में अन्य राज्यों की ओर पलायन को मजबूर कर देती है लेकिन चुनौतियों वहां भी खत्म नहीं होती पलायन अपना और अपनों कि जान का सौदा करके घर तक रोटी पहुंचाता है चाहे वह शोषण के रूप में हो या दुर्घटना के रूप में कई लोगों ने प्राण गवाए हैं कई लोग लोकलाज के डर से अपनों पे हुए शोषण के खिलाफ भी नही बोलते हैं।

 

ऐसी स्थिति में हम स्पंदन समाज सेवा समिति के माध्यम से उन असहाय लोगों कि आवाज बनकर निरंतर बोलना चाहते हैं जिससे आदिवासियों के मूल भूत मानव अधिकार जैसे अपनी संस्कृति के साथ जीवन यापन प्राक्रतिक संसाधनों पर अधिकार के साथ साथ आधुनिक महत्त्व के विषय शिक्षा, रोजगार, कौशल विकास जैसे महवपूर्ण हितों को भी साधा जा सके और इनके अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब इन्हें अपने घर मे अपनत्व मिले घर में ही रोजगार के अवसर हो जिससे जानलेवा पलायन पर रोक लगायी जा सके आदिवासियों के हितों को साधने के लिए निम्न कदम उठाये जाने भी जरूरी है !!

 

बनाये गये कानूनों जिसमे पेसा कानून प्रमुख है को जमीनी स्तर पर लागू करने में सरकारी संस्थाएं रुचि दिखाए ।

 

पैसा के प्रावधानों से जल, जंगल जमीन पर ग्राम सभा के माध्यम से वनोपज वनभूमि व अन्य प्राक्रतिक संसाधनों पर अधिकार मिले जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार श्रजित किये जा सकें

 

ग्रामसभा कि समितियों के माध्यम से प्राचीन विवाद निवारण व्यवस्था को लागू करे जिससे छोटे मोटे मुद्दे स्थानीय स्तर पर सुलझाये जा सकें जिससे लोग कानूनी दाव पेंचों से बचकर समय और पैसों कि बर्बादी को रो सकें।

 

आदिवासियों की प्राचीन परम्पराओं को पुनर्जीवित करने में मदद मिले जैसे पारंपरिक नृत्य, बोली खान पान, रीतिरिवाज त्यौहार, चिकित्सा पद्धति (जड़ी बूटियों से इलाज को भी महत्व मिले व इन्ही प्राकृतिक चिकितास्कों कि मदद से रुढिवादिता को भी खत्म किया जाये ।

 

आदिवासियों तक योजनाओ कि पहुंच को और सुगम बनाया जाये डिजिटल इंडिया से जोड़कर सभी को हितलाभ लेने में मदद कि जाये।

 

निम्न बातों पर अमल निश्चित ही धरातल पर लोकतंत्र के सपने को साकार करेगा और समतामूलक समाज कि स्थापना में आदिवासी भी अपना अमूल्य भागीदारी दे पाएंगे और मानवाधिकार दिवस का सपना साकार होगा मनीष शर्मा ।

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