उन्हेल में पुलिस बन गई गुंडा बुजुर्ग सड़क पर ले जाकर लाठियों से पीटा मानवाधिकार का हनन पुलिस कब करेगी दोषी पुलिस अधिकारियों पर रिपोर्ट दर्ज व अनुसात्मक कार्यवाही?
*उन्हेल में पुलिस बन गई गुंडा बुजुर्ग सड़क पर ले जाकर लाठियों से पीटा मानवाधिकार का हनन पुलिस कब करेगी दोषी पुलिस अधिकारियों पर रिपोर्ट दर्ज व अनुसात्मक कार्यवाही?*
उन्हेल / नागझिरी l ग्राम नागझिरी में पुलिस टीम पर हमले की घटना के बाद अब पुलिस की पूरी कार्रवाई और कानूनी वैधानिकता पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। इस मामले में एक तरफ पुलिस बल पर हमले और जवानों के घायल होने का दावा किया जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण पक्ष ने पुलिस की कार्यप्रणाली, गैरकानूनी बल प्रयोग और कानूनी नियमों की अनदेखी को लेकर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच की मांग की है।
पुलिस के अनुसार, ग्राम नागझिरी निवासी कंचनबाई पिता भावसिंह बंजारा ने करीब आठ दिन पहले सरदार सिंह के खिलाफ मारपीट और गाली-गलौज की शिकायत दर्ज कराई थी। इसी शिकायत के सिलसिले में बुधवार दोपहर करीब 12:15 बजे एसआई धारा सिंह चावड़ा पुलिस टीम के साथ आरोपी को पकड़ने पहुंचे थे। कानून और सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट निर्देश हैं कि सात वर्ष से कम सजा वाले मामलों या जमानती प्रकृति के विवादों में पुलिस को सीधे गिरफ्तारी करने के बजाय बीएनएसएस की धारा 35(3) के तहत नोटिस देना अनिवार्य होता है। ग्रामीणों का सवाल है कि क्या पुलिस ने पूर्व में सरदार सिंह को कोई नोटिस दिया था। यदि बिना नोटिस और बिना कानूनी प्रक्रिया का पालन किए पुलिस सीधे कार्रवाई करने पहुंची, तो यह विधिक प्रक्रिया के विरुद्ध है।


पुलिस का दावा है कि इस दौरान विवाद हुआ और पुलिस टीम पर लाठी-पत्थरों से हमला किया गया, जिसमें एसआई सहित चार पुलिसकर्मी घायल हुए। ग्रामीण पक्ष का सवाल है कि जब पुलिस ने अपने चार जवानों के घायल होने की गंभीर बात कही थी, तो घटना के अगले ही दिन बुजुर्ग सरदार सिंह को गांव में जुलूस के रूप में कैसे घुमाया गया। आरोप है कि वही पुलिसकर्मी, जिनके साथ कथित मारपीट की बात कही गई, वे ही बुजुर्ग को पाइप से पीटते हुए गांव में जुलूस निकाल रहे थे। यदि कथित मारपीट में जवान सचमुच घायल हुए थे, तो वे इस कार्रवाई में कैसे शामिल थे। किसी भी नागरिक को सार्वजनिक रूप से अपमानित करना, जुलूस निकालना या उसके साथ मारपीट करना कानून के शासन और मानवाधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
इस प्रकरण में एक महिला को छह माह के छोटे बच्चे के साथ न्यायिक हिरासत में जेल भेजे जाने पर भी कड़े सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीणों का तर्क है कि छह महीने के बच्चे के साथ एक महिला पुलिस पर आक्रमण करने की स्थिति में कैसे हो सकती है। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि जिन तीन अन्य लोगों को इस मामले में आरोपी बनाया गया है, उनकी गलती केवल इतनी थी कि वे पुलिस द्वारा महिलाओं के साथ की जा रही ज्यादती और मारपीट का वीडियो बना रहे थे। ग्रामीणों की मांग है कि पुलिस द्वारा मीडिया में जारी किए गए फोटो और बनाए गए वीडियो साक्ष्यों की सत्यता की उच्चस्तरीय जांच हो।
ग्रामीणों की मांग है कि वर्दी और खाकी की आड़ में कानून हाथ में लेने वाले, बुजुर्ग सरदार सिंह के साथ मारपीट करने वाले और मानवाधिकारों का हनन करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के विरुद्ध तत्काल गंभीर धाराओं में आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए। पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए, जिसमें पुलिस की केस डायरी, मेडिकल रिपोर्ट्स, बुजुर्ग की मेडिकल जांच और घटना के वीडियो फुटेज को निष्पक्षता से परखा जाए। छह माह के बच्चे के साथ जेल भेजी गई महिला और अन्य झूठे फंसाए गए ग्रामीणों को तुरंत रिहा किया जाए और झूठे मामले समाप्त किए जाएं। यदि प्रशासन द्वारा इस मामले में निष्पक्ष कदम नहीं उठाए जाते हैं, तो ग्रामीण पक्ष न्याय के लिए उच्च न्यायालय, मानवाधिकार आयोग और राज्य शासन के समक्ष उग्र आंदोलन करने के लिए बाध्य होगा।