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श्री लक्ष्मणी तीर्थ में नूतन जिनालय में सभी जिनबिंब, गुरूमूर्ति, देवी-देवता की मंत्रोच्चार, विधि विधान और धार्मिक क्रियाओं के साथ हुई पावनकारी प्रतिष्ठा।

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श्री लक्ष्मणी तीर्थ में नूतन जिनालय में सभी जिनबिंब, गुरूमूर्ति, देवी-देवता की मंत्रोच्चार, विधि विधान और धार्मिक क्रियाओं के साथ हुई पावनकारी प्रतिष्ठा।

आलीराजपुर। नगर से आठ किमी दूर स्थित लगभग 2000 वर्ष प्राचीन श्री लक्ष्मणी तीर्थ के जिर्णोद्धार पश्चात भव्यातिभव्य देव विमान तुल्य जिनालय के महामंगलकारी प्रतिष्ठा महोत्सव के पांचवे दिन रविवार को नूतन जिनालय में सभी जिनबिंब, गुरूमूर्ति, देवी-देवता की पावनकारी प्रतिष्ठा मंत्रोच्चार, विधि विधान और धार्मिक क्रियाओं के साथ सम्पन्न हुई। नूतन जिनालय के शिखर पर जैसे ही धर्म ध्वजा लहराई वैसे ही ढोल-नगाडों, शंख, घंटो, शहनाई की ध्वनि से तीर्थ परिसर गुंजायमान हो गया, तीर्थ परिसर में मौजूद हर व्यक्ति इस पल का साक्षी बनकर स्वयं को गौरवांवित महसूस करता नजर आया। इससे पूर्व सौधर्म वृहत्तपागच्छाधिपति परम पूज्य आचार्य देवेश श्रीमद विजय जयानंद सूरीश्वरीजी मसा एवं आचार्य देवेश दिव्यानंद सूरीश्वर जी महसा आदि श्रमण वृंद एवं श्रमणीवृंद की निश्रा में हर्षोल्लास के साथ सुबह शुभ मुहुर्त में विभिन्न बोलियों के लाभार्थी परिवार के सदस्य सहित सभी धर्मावलंबी नूतन जिनालय पर पहुंचे। हाथी पर बैठकर लाभार्थी परिवार ने नूतन जिनालय के बाहर तोरण मारा। जिसके पश्चात सभी जिनबिंब, गुरूमूर्ति, देवी-देवता की पावनकारी प्रतिष्ठा मंत्रोच्चार के साथ विधि प्रारंभ हुई, मंदिर के शिखर पर लाभार्थी परिवारों ने धर्म ध्वजा लहराई और गर्भ गृह में परमात्मा मूल नायक भगवान पद्मप्रभु, भगवान महावीर स्वामी, भगवान नेमीनाथजी सहित सभी जिनबिंब, गुरूमूर्ति, देवी-देवता की पावनकारी प्रतिष्ठा धार्मिक क्रियाओं के साथ संपन्न की। केशर की खुश्बु से महका लक्ष्मणी, ढोल-नगाडो, शंख, घंटो से गुंजायमान हुआ तीर्थ,इससे पूर्व लक्ष्मणी तीर्थ परिसर में प्रात: से मूलनायक भगवान पद्मप्रभु सहित सभी भगवाने, गुरू प्रतिमाओं की पूजा 9 बजे की श्रावक-श्राविकाओं द्वारा की गई, पश्चात प्रतिष्ठा की मंगलकारी विधि प्रारंभ हुई जिसके साक्षी जैन समाज के हजारों श्रावक-श्राविकाएं बने, जो कि गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडू, कर्नाटका, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, सहित देश के विभिन्न प्रांतो और हिस्सों से पहुंचे थे।

इस दौरान केशर की खुश्बु से संपूर्ण तीर्थ परिसर महकता, जैसे ही प्रतिष्ठा संपन्न हुई, ढोल-नगाडो, शंख और घंटों की ध्वनि से तीर्थ क्षेत्र गुंजायमान हो गया। इस दौरान सभी श्रावक विशेषकर युवा श्रावक जमकर नृत्य करते नजर आए। सभी श्रावक और श्राविकाओं के चेहरो पर असीम प्रसन्नता का भाव नजर आया। इस जगत के अंदर राग द्वेष नहीं होते तो जीव सुखी होते प्रतिष्ठा के पश्चात श्री राजेन्द्रसूरिश्वर क्रिया मंडप में समाजजनों ने आचार्य श्री एवं गुरूभगवंतो के समक्ष गुरूवंदन किया। पश्चात व्याख्यान में आचार्य देवेश श्रीमद् विजय दिव्यानंद सूरीश्वर जी महाराज साहब ने कहा कि आज पद्म प्रभु दादा को नूतन जिनालय में विराजित किया गया, जो कि ऐतिहासिक अवसर बना। नब्बे साल बाद प्रतिष्ठा का उदय आया। तीर्थंकर परमात्मा और उनकी आज्ञा, भक्ति और आज्ञा की भक्ति करना है। एकमात्र मानव भव ऐसा है जिसमें हमें प्रभु मिलते है और उनकी आज्ञा का पालन भी मिलता है। भक्तो को सिर्फ ये सोचना चाहिए कि मै कितना भाग्यशाली हूं। उन्होने पद्मप्रभु की देह के वर्ण के बारे में विस्तार से बताया। उन्होने कहा कि इस संसार में भटकने का कारण क्या है, व्यक्ति ममता के कारण भटक रहा है, परिभ्रमण का कारण भी ममता ही, जगत को अंधे करने वाली यह ममता राक्षसी है, ये ऐसी है कि अंदर के चक्षु बंद करती है। जो अहं और महं में जी रहा है वो अंधा है। परिवार, बंगला, गाडी, पद, पैसा कितनो पर मेरापना का सिक्का लगाया, ये बंधन आत्मा का। उन्होने कहा कि तीन साल में नूतन जिनालय बनकर तैयार हुआ, प्रतिष्ठा के लिये श्री पद्मप्रभ कल्याणजी जैन श्वेतांबर पब्लिक चेरीटेबल ट्रस्ट एवं श्री राजेन्द्र जयानंद सम्यग योग ट्रस्ट मुंबई द्वारा बहुत मेहनत की गई। तीर्थंकर परमात्मा करूणा के साग र है। प्रभु को मानते हो तो उनकी भावनाओं को पूरी करोगे। फलेचुन्दडी (बडी नवकारसी) हुई आयोजित महामंगलकारी प्रतिष्ठा के अवसर पर देश के विभिन्न क्षेत्रो से जैन समाजजन, जिले के जनप्रतिनिधि, गणमान्य नागरिक एवं विभिन्न समाजजनों ने भी मंदिर में भगवान के दर्शन कर प्रतिष्ठा के सुअवसर के सहभागी बने। तीर्थ परिसर में श्री भरत चक्रवर्ती भोजन मंडप में फलेचुन्दडी (बडी नवकारसी) हुई आयोजित हुई, जिसमें श्रावक-श्राविकाओं ने नवकारसी एवं स्वामीवात्सल्य का लाभ लिया। कार्यक्रम में जैन श्री संघ अलीराजपुर के सदस्यों सहित सभी समाजजनों, जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन का सराहनीय सहयोग रहा।

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