मुख्यमंत्री मोहन यादव के रोजगार दावे धरातल पर फेल आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों को बेरोजगार कर खुद सरकार बन रही बेरोजगारी की वजह
मुख्यमंत्री मोहन यादव के रोजगार दावे धरातल पर फेल
आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों को बेरोजगार कर खुद सरकार बन रही बेरोजगारी की वजह

ज्ञानेंद्र पांडेय 8516868379
अनूपपुर।
एक ओर मध्य प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी सरकार और प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव युवाओं को रोजगार देने के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सरकार के ही अधीन संचालित ताप विद्युत गृहों में वर्षों से कार्यरत आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटर एवं आईटीआई होल्डर कर्मचारियों को बिना किसी पूर्व सूचना के बेरोजगार कर दिया गया है। यह स्थिति मुख्यमंत्री के रोजगार सृजन के दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
मुख्यमंत्री द्वारा सार्वजनिक मंचों से यह घोषणा की जा रही है कि एक वर्ष के भीतर प्रदेश में लगभग तीन लाख युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा, जिसमें एक लाख सरकारी तथा दो लाख निजी क्षेत्र की नौकरियां शामिल होंगी। लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक उलट नजर आ रही है। चचाई ताप विद्युत गृह सहित प्रदेश के अन्य ताप विद्युत गृहों में कार्यरत आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों को अचानक सेवा से बाहर कर दिया गया।
टेंडर हुआ, फिर भी रोजगार छीना गया
प्राप्त जानकारी के अनुसार, आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों के लिए नियमानुसार टेंडर प्रक्रिया पूरी की गई थी और एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को निविदा भी स्वीकृत हुई। इसके बावजूद न तो संबंधित कंपनी को कार्यादेश (वर्क ऑर्डर) जारी किया गया और न ही वर्षों से कार्यरत कर्मचारियों को किसी प्रकार की पूर्व सूचना दी गई। अंततः टेंडर को निरस्त कर लगभग 26 आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों को एक साथ बेरोजगार कर दिया गया। यह निर्णय न केवल नियमों के विपरीत प्रतीत होता है, बल्कि इससे 26 परिवारों की आजीविका पर सीधा प्रहार हुआ है। वर्षों से ईमानदारी से सेवा दे रहे कर्मचारियों को अचानक हटाना प्रशासनिक लापरवाही और संवेदनहीनता को उजागर करता है।
अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी सामने आ रहे हैं कि ताप विद्युत गृहों में वर्षों से पदस्थ कुछ अधिकारी एवं प्रभावशाली कर्मचारी राजनीतिक संरक्षण के चलते न केवल अपने पदों पर जमे हुए हैं, बल्कि सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग भी कर रहे हैं। इन्हीं के कारण पहले आईटीआई होल्डर कर्मचारियों को हटाया गया और अब आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों को भी बेरोजगार किया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि ताप विद्युत गृहों में इन आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटरों की आवश्यकता नहीं थी, तो फिर निविदा प्रक्रिया के माध्यम से उनकी नियुक्ति क्यों की गई? और यदि आवश्यकता थी, तो फिर किस अधिकारी या जिम्मेदार व्यक्ति की लापरवाही के कारण एक साथ 26 परिवारों की आर्थिक स्थिति संकट में डाल दी गई?
जिम्मेदारों पर कार्रवाई की मांग
इस पूरे मामले में यह भी मांग उठ रही है कि जिन अधिकारियों की लापरवाही या कथित स्वार्थ के कारण यह स्थिति उत्पन्न हुई, उनके विरुद्ध विभागीय जांच कर सख्त कार्रवाई की जाए। यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या मोटी रकम और प्रभाव के दम पर कुर्सियां सुरक्षित रखने वाले ऐसे अधिकारियों को ताप विद्युत गृहों से हटाया जाना चाहिए।
बेरोजगारी बढ़ेगी तो बढ़ेगा सामाजिक असंतोष
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती बेरोजगारी का सीधा असर समाज पर पड़ता है। रोजगार छिनने से युवाओं में निराशा और असंतोष बढ़ता है, जो आगे चलकर सामाजिक अव्यवस्था और अपराध को जन्म दे सकता है। ऐसे में सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ-साथ पहले से कार्यरत कर्मचारियों के रोजगार की सुरक्षा भी सुनिश्चित करे। पूरे प्रदेश की समस्या
यह मामला केवल चचाई ताप विद्युत गृह तक सीमित नहीं है। प्रदेश के अन्य ताप विद्युत गृहों में भी इसी तरह के टेंडर और कार्यप्रणाली सामने आ रही है। ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि प्रदेश भर में बड़ी संख्या में आउटसोर्स कंप्यूटर ऑपरेटर और आईटीआई होल्डर कर्मचारी इसी तरह बेरोजगार किए गए होंगे। मंचों से रोजगार के वादे करना आसान है, लेकिन असली परीक्षा तब होती है जब सरकार अपने ही संस्थानों में रोजगार की रक्षा कर पाए। मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए यह समय आत्ममंथन का है कि उनके रोजगार संबंधी दावे केवल घोषणाओं तक सीमित न रह जाएं, बल्कि धरातल पर भी दिखाई दें।