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भक्ति और सेवा ही हमारी असली विरासत है

महाराज जी की बड़ी बात, शक्ति धाम में भक्तों का महासंगम

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*भक्ति और सेवा ही हमारी असली विरासत है” — महाराज जी की बड़ी बात, शक्ति धाम में भक्तों का महासंगम*

 

कल्याणपुर/इमलिया (नरसिंहपुर)

कल्याणपुर की पावन भूमि मंगलवार को उस ऐतिहासिक और दिव्य क्षण की साक्षी बनी, जब सैकड़ों भक्तों और संत-महात्माओं की उपस्थिति में शक्ति धाम आश्रम की परंपरा श्री 1008 श्री महंत ध्रुवदास महाराज जी (कल्याणपुर इमलिया) को विधिवत रूप से सौंप दी गई। यह वही तपोभूमि है, जहाँ ब्रह्मलीन परम पूज्य प्रकाशानंद सरस्वती जी महाराज ने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण माँ सिंहवाहिनी की साधना और मानव सेवा में अर्पित किया। उनके त्याग और तप की गूंज आज भी इस भूमि की मिट्टी में स्पष्ट रूप से महसूस की जा सकती है। सुबह से ही गाँव की गलियों में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। भव्य कलश यात्रा निकाली गई, जिसमें महिलाएँ, युवा और बच्चे उमंग और आस्था से सराबोर होकर सम्मिलित हुए। ढोल-नगाड़ों की थाप और गगनभेदी जयकारों से वातावरण भक्तिमय हो उठा। हर मोड़ पर फूलों और दीपों से स्वागत किया गया, और हृदयों में भक्ति की ज्वाला प्रज्वलित हो गई। समारोह में कई राज्यों और प्रदेशों से संत-महात्माओं ने भाग लिया।

 

मुख्य रूप से उपस्थित थे ।

 

श्री 1008 श्री महंत ध्रुवदास महाराज जी कल्याणपुर इमलिया, श्री महंत गोपाल दास जी आश्रम, अयोध्या श्री 1008 महामंडलेश्वर सियाराम दास जी , श्री महंत चंद्रदास जी (शक्ति धाम आश्रम, कल्याणपुर इमलिया श्री महंत विभूंदास जी सत्संग मंदिर, नासिक, महाराष्ट्र) और श्री 1008 महामंडलेश्वर सरकार जी फांसी घाट। महाराज जी ने उपस्थित भक्तों को संबोधित करते हुए कहा“आज मुझे यह पावन जिम्मेदारी मिली है, पर यह केवल मेरी नहीं है। यह हमारी परंपरा, हमारी आस्था और हमारे संकल्पों की जिम्मेदारी है। जो भक्त सच्चे मन से सेवा, भक्ति और साधना में लगेगा, वही शक्ति धाम का भविष्य उज्ज्वल करेगा। अपने तन, मन और धन को माँ सिंहवाहिनी की सेवा में समर्पित करना हमारा कर्तव्य है। यही सच्ची भक्ति और हमारी असली विरासत है।” सभी संतों ने उपस्थित भक्तों को गुरु परंपरा को जीवित रखने और सेवा को सर्वोपरि मानने का संदेश दिया। उन्होंने कहा“भक्ति और सेवा का मार्ग वही है, जो तन-मन-धन को समर्पित कर मानवता के कल्याण में जुटा रहता है। जो भक्त इस मार्ग को अपनाता है, वही सच्चा उत्तराधिकारी है।” पूजन-अर्चन और आशीर्वचन के उपरांत विशाल भंडारे का आयोजन हुआ। भक्तों ने प्रसादी ग्रहण कर स्वयं को धन्य और परिपूर्ण अनुभव किया। ग्रामीणों ने जगह-जगह संतों और श्रद्धालुओं का भव्य स्वागत किया, जिससे महोत्सव का स्वरूप और भी दिव्य बन गया। कार्यक्रम में उपस्थित भक्तों ने इसे केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि गुरु परंपरा के पुनर्जन्म के रूप में देखा। श्रद्धालुओं ने संकल्प लिया कि आश्रम की गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाया जाएगा और सेवा तथा साधना को जीवन का सर्वोपरि ध्येय बनाया जाएगा। कल्याणपुर की पावन धरा पर आस्था और भक्ति का यह अद्भुत संगम लंबे समय तक लोगों के हृदयों में

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