संवाददाता गणेश कुमार केवट की रिपोर्ट
महाकाल का ‘भौकाल’, खनिज विभाग मौन! अवैध उत्खनन से दहले गांव, प्रशासन सवालों के घेरे में
शहडोल-उमरिया सीमा से उठती रेत की धूल अब सिर्फ नदी किनारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर भी मोटी परत बनकर जम गई है। महाकाल के नाम पर संचालित खनन गतिविधियों ने दर्जनों गांवों की शांति छीन ली है। ग्रामीणों का आरोप है कि खुलेआम हो रहे अवैध उत्खनन और परिवहन पर खनिज विभाग की चुप्पी ने पूरे मामले को संदेहास्पद बना दिया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि दिन-रात दौड़ते हाइवा और ट्रैक्टर न केवल सड़कों को छलनी कर रहे हैं, बल्कि खेतों और नदी तटों का अस्तित्व भी निगल रहे हैं। सवाल यह है कि जब नियम-कायदे स्पष्ट हैं, तो फिर महाकाल कंपनी को इतनी खुली छूट किसके इशारे पर मिल रही है? क्या खनिज विभाग ने आंखें मूंद ली हैं, या फिर सब कुछ ‘मिलीभगत’ के तहत चल रहा है?
ग्रामीणों की मांग है कि अवैध उत्खनन पर तत्काल रोक लगे और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो। लेकिन अब तक न तो ठोस कार्रवाई दिखी और न ही विभाग की ओर से कोई स्पष्ट जवाब। इससे आक्रोश बढ़ता जा रहा है और आंदोलन की रूपरेखा तैयार हो रही है।
सबसे बड़ा सवाल खनिज विभाग की कार्यप्रणाली पर है। यदि सब कुछ नियमों के तहत है तो पारदर्शिता क्यों नहीं? और यदि अनियमितताएं हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं? महाकाल के नाम पर मचे इस ‘भौकाल’ ने प्रशासन की साख पर गहरा धब्बा लगा दिया है। अब देखना यह है कि विभाग जवाबदेही तय करता है या फिर गांवों की पीड़ा यूं ही रेत में दफन होती रहेगी।