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रेत से लिखी जा रही लूट की दास्तां: बुढ़ार-जरवाही में कैसे फल-फूल रहा है रेत माफिया?

बिना टेंडर, बिना डर — बुढ़ार में रात-दिन चल रही 'सोने जैसी रेत' की खुली लूट

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रेत से लिखी जा रही लूट की दास्तां: बुढ़ार-जरवाही में कैसे फल-फूल रहा है रेत माफिया?

 

बिना टेंडर, बिना डर — बुढ़ार में रात-दिन चल रही ‘सोने जैसी रेत’ की खुली लूट

 

शहडोल जिले के बुढ़ार थाना क्षेत्र अंतर्गत जरवाही, पकरीया, बाटली और काशेड घाट जैसे गांवों में इन दिनों रेत की अवैध खुदाई, परिवहन और बिक्री खुलेआम और बेरोक-टोक जारी है। “ग्लोबल सहकार” द्वारा रेत खनन का टेंडर सरेंडर करने के बाद इस खाली स्थान को भरने में सबसे तेज निकले रेत माफिया, जिन्होंने बिना रॉयल्टी, बिना वैध दस्तावेजों के, हर रात सैकड़ों ट्रैक्टर अवैध रेत खनन कर इलाके की रगों से सोना निकालना शुरू कर दिया है।

 

3500 में रेत, ऊपर तक सेट” — रेत माफिया की खुली चुनौती

 

स्थानीय सूत्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार:

 

हमने ऊपर तक सब सेट कर रखा है, दम है तो पकड़ के दिखाओ। रॉयल्टी नहीं, टीवी नहीं — बस तेल भरो और रेत ले जाओ।”

 

रेत का ट्रैक्टर ₹3500 से ₹4000 में बिना किसी वैध कागज के सप्लाई किया जा रहा है। कोई ट्रैकिंग सिस्टम, जीपीएस या पर्यावरणीय मानक लागू नहीं है। सरकारी राजस्व को भारी नुकसान और पर्यावरण को गंभीर खतरा पहुंच रहा है — लेकिन जिम्मेदार महकमे अब भी खामोश हैं।

 

जब पत्रकार बना अपराधी का भागीदार

 

सबसे चौंकाने वाला मामला पकरीया गांव के एक तथाकथित पत्रकार का है, जो खुद को मीडिया का ‘सिपाही’ बताकर रेत माफिया की लॉबी में सक्रिय रूप से शामिल है।

रात में चोरी, और दिन में शासन-प्रशासन पर दिखावटी सवालों की झड़ी — यह नकली पत्रकारिता का घिनौना चेहरा उजागर करता है।

 

नाम उजागर: कौन चला रहा है रेत का यह अवैध सम्राज्य?

 

स्थानीय सूत्रों के अनुसार, इस पूरे रैकेट में मुख्य रूप से शामिल हैं:मुन्ना ,अरुण ,अभिषेक ,सोनू ये चारों पुलिस, वन विभाग और खनिज विभाग की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अपने मुखबिर नियुक्त कर चुके हैं। शाम ढलते ही ये होटल और चाय दुकानों में बैठकर ‘मैनेजमेंट’ तय करते हैं।

 

अधिकारियों की चुप्पी सवालों के घेरे में जब टेंडर नहीं है, ट्रैकिंग नहीं है, तो फिर हर दिन सैकड़ों ट्रैक्टर रेत कैसे भर रहे हैं?

वन विभाग, पुलिस और खनिज विभाग की नाक के नीचे यह लूट कैसे संभव है?

क्या चुप्पी की कीमत ‘ऊपर तक पहुंचता पैसा’ है?

 

 

कानून की असफलता या मिलीभगत का नमूना?

 

यह सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक सिस्टम के पतन की कहानी है।

जहां शासन की चुप्पी, प्रशासन की ढिलाई और कानून के रखवालों की नज़रअंदाज़ी ने रेत माफियाओं को अपराधी से ‘प्रशासक’ बना दिया है अगर रेत से तिजोरी भर रही है, तो सवाल भी उठेंगे। लोकतंत्र में लूट की इजाज़त नहीं!”

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