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नगर परिषद में 65 पार मजदूर की सेवा जारी — नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां या फिर एक सुनियोजित साज़िश?

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बरगवां-अमलाई नगर परिषद में 65 पार मजदूर की सेवा जारी — नियमों की उड़ाई जा रही धज्जियां या फिर एक सुनियोजित साज़िश?

अनूपपुर, बरगवां-अमलाई नगर परिषद एक बार फिर विवादों और पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में है। इस बार मुद्दा है एक 65 वर्ष से अधिक उम्र के दैनिक वेतनभोगी मजदूर को नियमों के विरुद्ध सेवा में बनाए रखने का, जबकि राज्य शासन के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार, इस आयु सीमा के बाद किसी भी मजदूर को सेवा में नहीं रखा जा सकता।

 

मामले की तह तक:

 

जिले के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, एक बुजुर्ग मजदूर जो कि नगर परिषद के एक वरिष्ठ अधिकारी का “साहित्यिक मित्र” और घनिष्ठ संबंधी बताया जा रहा है, उसे 65 की उम्र पार करने के बावजूद न केवल कार्यरत रखा गया है, बल्कि मासिक वेतन भी दिया जा रहा है।

इस स्थिति ने नगर परिषद के कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं:

क्या अब नियम सिर्फ कागज़ों तक सीमित रह गए हैं?”

“क्या नगर परिषद अब सिर्फ ‘अपने लोगों’ के लिए नियम बदलता है?”

 

 

श्रम कानून और उम्र सीमा क्या कहते हैं?

 

भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय, मध्यप्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961, तथा दैनिक वेतनभोगी सेवा दिशा-निर्देशों के अनुसार:

 

दैनिक वेतनभोगी कर्मियों की अधिकतम सेवा आयु 62 वर्ष निर्धारित है।

62 वर्ष की उम्र पूरी होने के बाद, उन्हें पेंशन, ईपीएफ और अन्य लाभों के साथ सेवानिवृत्त किया जाना अनिवार्य है।

सेवा में बनाए रखना नियम उल्लंघन है और यह गंभीर प्रशासनिक त्रुटि की श्रेणी में आता है।

 

 

“रिश्तों” के नाम पर “नियमों” की बलि?

 

बताया जा रहा है कि यह बुजुर्ग कर्मचारी कई वार्डों में मज़ाक और चर्चा का विषय बना हुआ है। विकास कार्यों की बैठक में, घर की चौखट पर बैठकर गपशप और “रणनीति निर्धारण” करना ही उसका प्रमुख कार्य बन गया है।

 

कुर्सी सिर्फ काम के लिए नहीं, अब पहचान और रिश्तों की वस्तु बन चुकी है।”

 

 

 

नगर परिषद में पहले भी आरोप देने लगे हैं — रिश्तेदारों को ठेके, मित्रों को नौकरी, चहेतों को स्थायी पद। अब तो ऐसा लगता है कि “मित्रता की गहराई” के सामने शासन के नियम भी बौने पड़ गए हैं।

क्या शासन की आंखें अब भी बंद रहेंगी?

क्या नगर परिषदों को निजी संगठन समझने की प्रवृत्ति ऐसे ही बढ़ती जाएगी?

क्या नियमों को धता बताकर सरकारी खजाने की लूट को अनदेखा किया जाएगा?

 

ये रिश्ता क्या कहलाता है?

 

शायद — नियमों को रौंद कर निभाई गई दोस्ती का रिश्ता,

जहां पेंशन की जगह ‘पैसा’ और जवाबदेही की जगह ‘जुगाड़’ बैठा है।”

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