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कार्यालयों में आराम जंगल में अव्यवस्था

अमरकंटक रेंज में मादा तेंदुए की हत्या ने खोली वन विभाग की पोल:शीर्ष स्तर के सख्त आदेशों की अनदेखी

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कार्यालयों में आराम जंगल में अव्यवस्था

 

अमरकंटक रेंज में मादा तेंदुए की हत्या ने खोली वन विभाग की पोल:शीर्ष स्तर के सख्त आदेशों की अनदेखी

 

 

फील्ड से हटाए गए वनपाल, दो संवेदनशील बीटों का जिम्मा एक गार्ड पर

 

अवैध शिकारियों को मिला खुला मैदान

 

 

ज्ञानेंद्र पांडेय 7974034465

अनूपपुर।

मध्यप्रदेश वन विभाग द्वारा वर्षों पहले जारी किए गए स्पष्ट और सख्त निर्देशों के बावजूद अमरकंटक वन परिक्षेत्र में उनकी खुलेआम अवहेलना सामने आई है। विभागीय लापरवाही, गलत पदस्थापनाओं और कमजोर निगरानी का नतीजा अगस्त माह में दमगढ़ बीट के समीप एक मादा तेंदुए की निर्मम हत्या के रूप में सामने आया। तेंदुए का शव संदिग्ध अवस्था में बरामद हुआ था, जिसमें से सिर और चारों पंजे गायब थे। यह तथ्य इस ओर साफ इशारा करता है कि मामला सामान्य नहीं, बल्कि संगठित वन्यजीव तस्करी और अवैध शिकार गिरोह से जुड़ा हुआ है।

 

 

शीर्ष स्तर के आदेश ठंडे बस्ते में

 

प्रधान मुख्य वन संरक्षक कार्यालय से जारी आदेशों में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि

कोई भी वनरक्षक या वनपाल किसी भी स्तर के कार्यालयीन कार्य में संलग्न नहीं रहेगा। उनकी पदस्थापना केवल बीट, जांच नाका, उड़नदस्ता एवं वन सुरक्षा से जुड़े कार्यों में ही की जाएगी। इन आदेशों का उद्देश्य वन्यजीव संरक्षण को मजबूत करना, अवैध कटाई पर अंकुश लगाना और शिकार व तस्करी की घटनाओं को रोकना था। लेकिन अमरकंटक रेंज में इन आदेशों को कागजों तक सीमित कर दिया गया, जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत नजर आ रही है।

 

 

दो बीटों का जिम्मा एक गार्ड पर, कार्यवाहक वनपाल कार्यालय में ‘आराम’

 

 

प्राप्त जानकारी के अनुसार, अमरकंटक वन परिक्षेत्र की दमगढ़ और हराई बीट, जो कि वन्यजीव दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील मानी जाती हैं, एक ही बीट गार्ड के भरोसे छोड़ दी गई थीं।

ग्रामीणों और जानकारों का कहना है कि दोनों बीटों का क्षेत्रफल काफी बड़ा है, जहां एक अकेले कर्मचारी द्वारा प्रभावी निगरानी और नियमित गश्त कर पाना व्यावहारिक रूप से असंभव है। इसी का लाभ उठाकर जंगल में अवैध गतिविधियां फलती-फूलती रहीं।

इसके विपरीत, सूत्रों के अनुसार कार्यवाहक वनपाल रमाकांत पटेल, जिनकी पदस्थापना विभागीय आदेश के तहत वन विद्यालय से अमरकंटक वन परिक्षेत्र में की गई थी, उन्हें मैदानी क्षेत्र में भेजने के बजाय कार्यालय में बैठाकर रखा गया।

यह स्थिति न केवल विभागीय आदेशों की खुली अवहेलना को दर्शाती है, बल्कि यह भी संकेत देती है कि कुछ कर्मचारियों को कार्यालयों में आराम दिया जा रहा है जबकि फील्ड में तैनात कर्मचारियों पर अतिरिक्त और असहनीय कार्यभार डाला जा रहा है।

 

 

तेंदुए की गतिविधियों की जानकारी क्यों नहीं?

 

स्थानीय ग्रामीणों और विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, मादा तेंदुआ घटना से पहले काफी समय तक अमरकंटक रेंज और आसपास के ग्रामीण इलाकों में विचरण कर रही थी।

ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या अमरकंटक रेंज के रेंजर वीरेंद्र श्रीवास्तव को तेंदुए की गतिविधियों की जानकारी नहीं थी और यदि जानकारी थी, तो फिर: समय रहते निगरानी क्यों नहीं बढ़ाई गई गश्ती दल और उड़नदस्ते क्यों सक्रिय नहीं किए गए संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त बल की तैनाती क्यों नहीं की गई वन विभाग का दावा रहता है कि वन्यजीवों की गतिविधियों की जानकारी फील्ड स्टाफ से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक नियमित रूप से पहुंचती है। फिर इस मामले में यह पूरा तंत्र पूरी तरह विफल कैसे हो गया, यह गंभीर जांच का विषय है।

 

 

यदि मानव जान जाती तो जिम्मेदारी कौन लेता?

 

 

ग्रामीणों के बीच यह चिंता भी लगातार सामने आ रही है कि यदि इसी दौरान तेंदुआ किसी ग्रामीण पर हमला कर देता या किसी निर्दोष व्यक्ति की जान चली जाती, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेता?

जब वन विभाग के पास वाहन, संसाधन और स्टाफ उपलब्ध होने का दावा किया जाता है, तब वन्यजीवों और मानव जीवन की सुरक्षा में ऐसी घोर लापरवाही को कैसे सही ठहराया जा सकता है?

 

 

चार माह बाद भी मुख्य आरोपी फरार

 

 

घटना को चार माह से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन स्थिति यह है कि मादा तेंदुए की हत्या का मुख्य आरोपी अब तक फरार है किसी भी जिम्मेदार अधिकारी पर कोई ठोस विभागीय कार्रवाई नहीं हुई क्षेत्र में अवैध कटाई और वन्यजीव शिकार की घटनाओं में कमी के बजाय बढ़ोतरी देखी जा रही है यह हालात विभागीय जांच, रणनीति और खुफिया तंत्र की गंभीर विफलता को उजागर करते हैं।

 

सवालों के घेरे में अमरकंटक रेंज का प्रबंधन

 

ग्रामीणों, पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि यदि समय रहते फील्ड स्टाफ की सही तैनाती की जाती, शीर्ष स्तर के आदेशों का पालन होता और रेंज स्तर पर जिम्मेदारी से कार्य किया जाता, तो शायद एक बेजुबान वन्यजीव की जान बचाई जा सकती थी।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमरकंटक रेंज में हुई इस गंभीर लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों, विशेषकर रेंजर वीरेंद्र श्रीवास्तव की जवाबदेही तय होगी?

या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा?

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